देश कि राजधानी दिल्ली ,ये वोह शहर है जहाँ हमारे देश के वर्तमान एवं भविष्य का निर्णय होता है ,हमारे देश का शाशन सँभालने वाले बड़े बड़े राज नेता यहीं से देश कि सत्ता सँभालते हैं ,इस शहर में प्राचीन सभ्यता के भी निशान देखने को मिलते हैं ,लाल किला ,क़ुतुब मीनार जैसी प्राचीन इमारतें इसका बहुत अच्चा उदहारण प्रस्तुत करती हैं , आज कल इस शहर में मानो भूचाल सा आया हुआ है ,एक तरफ कुदरत है जो अपने कहर से इस शहर को भिगोये चली जा रही है ,दूसरी तरफ सरकार जो अपनी वाह वाही के लिए शहर के आम आदमी पे कहर बरपा रही है ,"कॉमन वेल्थ गेम्स" का हमारे देश कि राजधानी में होना जहाँ एक तरफ गर्व कि बात है वहीँ दूसरी तरफ दुःख कि ,इन खेलों के होने से जितना फायेदा नहीं होगा उससे कई गुना ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ेगा ,जो लोग रोज़ कमा कर खाते हैं उनके तो जैसे हाथ ही कट गए हैं न कम सकेंगे न खा सकेंगे ,सरकार ने खेलो के महत्त्व को समझा बहुत अच्छा किया परन्तु क्या हमारी सरकार इतनी बेहोश हैं कि उसे आम आदमी कि परेशानियाँ नहीं दिखाई देती,देश कि उन्नति कि बड़ी बड़ी बातें तो हमारी सरकार करती है ,लेकिन क्या इस तरह से हमारा देश उन्नत होगा कभी,हम बात कर रहे हैं दिल्ली शहर कि जहाँ आज जगह जगह सड़के खुदी पड़ी हैं,कहीं मेट्रो का काम तो कहीं फ्लाईओवर बनाने का काम सरकार के पास मानो पैसों कि खान हाथ लग गयी है ,लेकिन आम आदमी का क्या जिसको दिन पे दिन कभी महंगाई से कभी,इज्ज़त के डर से या कभी बेरोज़गारी से मार पड़ती ही रहती है, क्या कोई कभी कुछ करेगा इस मामले में या सब तमाशाई बनकर तमाशा ही देखते रहेंगे ,कोई जवाब दे सकता है कि इस सब से किसका भला होना है ,क्यूँ बार बार देश के सोदागारों को हम सत्ता थमा देते हैं हमारी ज़िन्दगी का सौदा करने के लिए, ऐसा लगता है मानो हम वापिस शून्य कि तरफ बढ़ते जा रहे हैं ........................समझ नहीं आता कि खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................????Sunday, September 26, 2010
खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................?????
देश कि राजधानी दिल्ली ,ये वोह शहर है जहाँ हमारे देश के वर्तमान एवं भविष्य का निर्णय होता है ,हमारे देश का शाशन सँभालने वाले बड़े बड़े राज नेता यहीं से देश कि सत्ता सँभालते हैं ,इस शहर में प्राचीन सभ्यता के भी निशान देखने को मिलते हैं ,लाल किला ,क़ुतुब मीनार जैसी प्राचीन इमारतें इसका बहुत अच्चा उदहारण प्रस्तुत करती हैं , आज कल इस शहर में मानो भूचाल सा आया हुआ है ,एक तरफ कुदरत है जो अपने कहर से इस शहर को भिगोये चली जा रही है ,दूसरी तरफ सरकार जो अपनी वाह वाही के लिए शहर के आम आदमी पे कहर बरपा रही है ,"कॉमन वेल्थ गेम्स" का हमारे देश कि राजधानी में होना जहाँ एक तरफ गर्व कि बात है वहीँ दूसरी तरफ दुःख कि ,इन खेलों के होने से जितना फायेदा नहीं होगा उससे कई गुना ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ेगा ,जो लोग रोज़ कमा कर खाते हैं उनके तो जैसे हाथ ही कट गए हैं न कम सकेंगे न खा सकेंगे ,सरकार ने खेलो के महत्त्व को समझा बहुत अच्छा किया परन्तु क्या हमारी सरकार इतनी बेहोश हैं कि उसे आम आदमी कि परेशानियाँ नहीं दिखाई देती,देश कि उन्नति कि बड़ी बड़ी बातें तो हमारी सरकार करती है ,लेकिन क्या इस तरह से हमारा देश उन्नत होगा कभी,हम बात कर रहे हैं दिल्ली शहर कि जहाँ आज जगह जगह सड़के खुदी पड़ी हैं,कहीं मेट्रो का काम तो कहीं फ्लाईओवर बनाने का काम सरकार के पास मानो पैसों कि खान हाथ लग गयी है ,लेकिन आम आदमी का क्या जिसको दिन पे दिन कभी महंगाई से कभी,इज्ज़त के डर से या कभी बेरोज़गारी से मार पड़ती ही रहती है, क्या कोई कभी कुछ करेगा इस मामले में या सब तमाशाई बनकर तमाशा ही देखते रहेंगे ,कोई जवाब दे सकता है कि इस सब से किसका भला होना है ,क्यूँ बार बार देश के सोदागारों को हम सत्ता थमा देते हैं हमारी ज़िन्दगी का सौदा करने के लिए, ऐसा लगता है मानो हम वापिस शून्य कि तरफ बढ़ते जा रहे हैं ........................समझ नहीं आता कि खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................????Friday, September 24, 2010
कोई मेरी सुनो...................
मैं पोस्ट बॉक्स हूँ,वही लाल काला डिब्बा जिसे देख बच्चे खुश हो जाया करते थे,मेरी दुनियाँ पीले नीले कागजों से सजी रहती थी जो आज वीरान सी पड़ी है,आज मुझे कुछ कहना है ,कल जो मैं सबके लिए इतना मायेने रखता था आज बेमाने हो गया हूँ ,मेरा वजूद न जाने कहाँ खो सा गया है,सड़क किनारे मैं मौन सा खड़ा ,किसी के ख़त का इंतज़ार करता रहता हूँ कि शायद आज किसी भूले भटके को मेरी भी सुध आ जाये ,इस इन्टरनेट कि चमकीली दुनियाँ में,मेरे होने का तो जैसे आज किसी को अहसास ही नहीं,मेरे ना होने से किसी कोई शिकायत नहीं ,कल तक मैं ही था जो सबके संदेशे भेजा करता था ,आज मेरे डाकिये का भी मुझे पता नहीं मिलता, मुझपे लगा ताला जो रोज़ खुला करता था आज ,कई कई दिनों तक उसे कोई नहीं खोलता ,मेरी जगह आज हाई स्पीड मेल सर्विस ने ले ली है कुछ मिनटों में ही संदेसा पहुँच जाता है,अब कौन करता है डाकिये का इंतज़ार,कौन देखता है राह कि आयेगा किसी प्रियजन का ख़त.मुझे भी लगता है कि मैं शायद फिर से कभी लोगों को याद आऊँगा ,उस पल मैं खुद को सबसे खुशनसीब पाउँगा,पर कोई मेरी सुनता ही नहीं ,मैं भी चाहता हूँ कि कोई मेरी भी सुने.
Subscribe to:
Comments (Atom)