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Sunday, September 26, 2010

खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................?????

देश कि राजधानी दिल्ली ,ये वोह शहर है जहाँ हमारे देश के वर्तमान एवं भविष्य का निर्णय होता है ,हमारे देश का शाशन सँभालने वाले बड़े बड़े राज नेता यहीं से देश कि सत्ता सँभालते हैं ,इस शहर में प्राचीन सभ्यता के  भी निशान  देखने को मिलते  हैं ,लाल किला ,क़ुतुब मीनार जैसी प्राचीन  इमारतें इसका बहुत अच्चा उदहारण प्रस्तुत करती हैं , आज कल इस शहर में मानो भूचाल सा आया हुआ है ,एक तरफ कुदरत है जो अपने कहर से इस शहर को भिगोये चली जा रही है ,दूसरी तरफ सरकार जो अपनी वाह वाही के लिए शहर के आम आदमी पे कहर बरपा रही है ,"कॉमन वेल्थ गेम्स" का हमारे देश कि राजधानी में होना जहाँ एक तरफ गर्व कि बात है वहीँ दूसरी तरफ दुःख कि ,इन खेलों के होने से जितना फायेदा नहीं होगा उससे कई गुना ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ेगा ,जो लोग रोज़ कमा कर खाते हैं उनके तो जैसे हाथ ही कट गए हैं न कम सकेंगे न खा सकेंगे ,सरकार ने खेलो के महत्त्व को समझा बहुत अच्छा किया परन्तु क्या हमारी सरकार इतनी बेहोश हैं कि उसे आम आदमी कि परेशानियाँ नहीं दिखाई देती,देश कि उन्नति कि बड़ी बड़ी बातें तो हमारी सरकार करती है ,लेकिन क्या इस तरह से हमारा देश उन्नत होगा कभी,हम बात कर रहे हैं दिल्ली शहर कि जहाँ आज जगह जगह सड़के खुदी पड़ी हैं,कहीं मेट्रो का काम तो कहीं फ्लाईओवर बनाने का काम सरकार के पास मानो पैसों कि खान हाथ लग गयी है ,लेकिन आम आदमी का क्या जिसको दिन पे दिन कभी महंगाई से कभी,इज्ज़त के डर से या कभी बेरोज़गारी से मार पड़ती ही रहती है, क्या कोई कभी कुछ करेगा इस मामले में या सब तमाशाई बनकर तमाशा ही देखते रहेंगे ,कोई जवाब दे सकता है कि इस सब से किसका भला होना है ,क्यूँ बार बार देश के सोदागारों को हम सत्ता थमा देते हैं हमारी ज़िन्दगी का सौदा करने के लिए,  ऐसा लगता है मानो हम वापिस शून्य कि तरफ बढ़ते जा रहे हैं ........................समझ नहीं आता  कि  खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................????

4 comments:

  1. आज की दुनिया का कटु शाश्वत वास्तविक सत्य ..

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  2. बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने .......

    पढ़िए और मुस्कुराइए :-
    आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

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  3. काफी अच्छा लिखा है आपने. प्रसंशनीय.
    जारी रहें.

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