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Saturday, October 2, 2010

मैं..................................

मैं अर्थात अहम् अहंकार ,मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु " मैं ",पचीन परंपरा रही है कि हिन्दू परिवारों में संयुक्त परिवारों का प्रचलन था जिसमे परिवार का बुजुर्ग घर का मुखिया होता था जो कि परिवार के बाकी सदस्यों का उत्तरदायित्व उठाता था ,परिवार का हर सदस्य अपनी भूमिका बहुत ही सुन्दर तरीके से निभाता था ,सभी सदस्यों में प्रेम एवं त्याग कि भावना का समन्वय था ,सयुंक्त परिवार के बहुत से फायेदे थे छोटों कि पर्वर्रिश बड़ो के प्रेम वृछ तले होती ,कितनी खुशियाँ एक साथ एक ही छत के नीचे मिलती,अच्छा लगता बड़ों का डांटना भी ,एक सभ्य समाज के निर्माण में भी संयुक्त  परिवारों का अच्छा ख़ासा योगदान रहा है क्यूंकि एक अच्छे  नागरिक का जन्म एक अच्छे सभ्य परिवेश में होता है ,परिवार के सदस्य ही एक बच्चे को अच्छे बुरे एवं सही गलत कि शिक्षा देते हैं ,परन्तु आज ये परिवार समाज से विलुप्त से हो गए हैं,पता नहीं क्यूँ लोग अपने उत्तरदायित्वों से मुंह  चुराने कि कोशिश करते रहते हैं ,परिवार में बड़ों आशीर्वाद देव तुल्य माना गया है अगर बड़ों का साया सर है तो बड़ी से बड़ी मुशिकिलों को भी पार किया जा सकता है ,परन्तु आज आधुनिकता का पिशाच परिवारों कि शांति भंग कर चूका है,हर मनुष्य हर समय कभी विषाद कभी उच्च रक्त चाप जैसी रोगों से छोटी सी आयु में ही जूझना शुरू कर देता है ,सच में बहुत याद आता है वो दादी -नानी को छेड़ना उनकी झुर्रियों वाली खाल का सदा आलू बनाना घर में सब भाई बहनों का इकठ्ठा होकर मस्ती मारना ,जीवन में आत्म सुख के लिए हम कितना अमूल्य सुख खो चुके हैं कभी सोचा है. नहीं ना सच है नहीं सोच सकते क्यूंकि ,हमारे पास समय हही नहीं है .आज एकाकी परिवार परंपरा कितना सुख दे पाती है माँ बाप जब काम पे जाते हैं बच्चे किसे सौंप कर जाएँ यह बहुत बड़ी समस्या सामने आती है ,क्या गारंटी है कि जिस किसी को भी यह उत्तर्रदयित्व वोह सौंपेंगे उसकी नीगरानी में वोह सुरच्छित रहेंगे और अच्छे संस्कार ही सीखेंगे ,इन सारी चीज़ों के नुकसान किसका है ,एक प्रश्न है मेरा यह "मैं" "अहम्" किसका हित कारी रहा है जो हम इसे त्याग नहीं सकते ,जहाँ "मैं" का समावेश होता है वहां "हम" कि भावना का कोई स्थान नहीं ,यह "मैं" है जो हमें सुखों से दूर करता है जानते हुए भी इस "मैं" का इतना महत्व क्यूँ है हमारे जीवन में....................


अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ 



अर्थात 
यह तेरा है यह मेरा है ,ऐसी सोच संकुचित एवं तुच्छ बुद्धि के लोगों में होई है ,जो समझदार एवं ज्ञानी मनुष्य हैं, उनके लिए तो पूरा विश्व उनका कुटुंब है!

Sunday, September 26, 2010

खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................?????

देश कि राजधानी दिल्ली ,ये वोह शहर है जहाँ हमारे देश के वर्तमान एवं भविष्य का निर्णय होता है ,हमारे देश का शाशन सँभालने वाले बड़े बड़े राज नेता यहीं से देश कि सत्ता सँभालते हैं ,इस शहर में प्राचीन सभ्यता के  भी निशान  देखने को मिलते  हैं ,लाल किला ,क़ुतुब मीनार जैसी प्राचीन  इमारतें इसका बहुत अच्चा उदहारण प्रस्तुत करती हैं , आज कल इस शहर में मानो भूचाल सा आया हुआ है ,एक तरफ कुदरत है जो अपने कहर से इस शहर को भिगोये चली जा रही है ,दूसरी तरफ सरकार जो अपनी वाह वाही के लिए शहर के आम आदमी पे कहर बरपा रही है ,"कॉमन वेल्थ गेम्स" का हमारे देश कि राजधानी में होना जहाँ एक तरफ गर्व कि बात है वहीँ दूसरी तरफ दुःख कि ,इन खेलों के होने से जितना फायेदा नहीं होगा उससे कई गुना ज्यादा नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ेगा ,जो लोग रोज़ कमा कर खाते हैं उनके तो जैसे हाथ ही कट गए हैं न कम सकेंगे न खा सकेंगे ,सरकार ने खेलो के महत्त्व को समझा बहुत अच्छा किया परन्तु क्या हमारी सरकार इतनी बेहोश हैं कि उसे आम आदमी कि परेशानियाँ नहीं दिखाई देती,देश कि उन्नति कि बड़ी बड़ी बातें तो हमारी सरकार करती है ,लेकिन क्या इस तरह से हमारा देश उन्नत होगा कभी,हम बात कर रहे हैं दिल्ली शहर कि जहाँ आज जगह जगह सड़के खुदी पड़ी हैं,कहीं मेट्रो का काम तो कहीं फ्लाईओवर बनाने का काम सरकार के पास मानो पैसों कि खान हाथ लग गयी है ,लेकिन आम आदमी का क्या जिसको दिन पे दिन कभी महंगाई से कभी,इज्ज़त के डर से या कभी बेरोज़गारी से मार पड़ती ही रहती है, क्या कोई कभी कुछ करेगा इस मामले में या सब तमाशाई बनकर तमाशा ही देखते रहेंगे ,कोई जवाब दे सकता है कि इस सब से किसका भला होना है ,क्यूँ बार बार देश के सोदागारों को हम सत्ता थमा देते हैं हमारी ज़िन्दगी का सौदा करने के लिए,  ऐसा लगता है मानो हम वापिस शून्य कि तरफ बढ़ते जा रहे हैं ........................समझ नहीं आता  कि  खुश होऊं या आंसू बहाऊँ ......................????

Friday, September 24, 2010

कोई मेरी सुनो...................





मैं पोस्ट बॉक्स हूँ,वही लाल काला डिब्बा जिसे देख बच्चे खुश हो जाया करते थे,मेरी दुनियाँ पीले नीले कागजों से सजी रहती थी जो आज वीरान सी पड़ी है,आज मुझे कुछ कहना है ,कल जो मैं सबके लिए इतना मायेने रखता था आज बेमाने हो गया हूँ ,मेरा वजूद न जाने  कहाँ खो सा गया है,सड़क किनारे मैं मौन सा खड़ा ,किसी के ख़त का इंतज़ार करता रहता हूँ कि शायद आज किसी भूले भटके को मेरी भी सुध आ जाये ,इस इन्टरनेट कि चमकीली दुनियाँ में,मेरे होने का तो जैसे आज किसी को अहसास ही नहीं,मेरे ना होने से किसी कोई शिकायत नहीं ,कल तक मैं ही था जो सबके संदेशे भेजा करता  था ,आज मेरे डाकिये का भी मुझे पता नहीं मिलता, मुझपे लगा ताला जो रोज़ खुला करता था आज ,कई कई दिनों तक उसे कोई नहीं खोलता ,मेरी जगह आज हाई स्पीड मेल सर्विस ने ले ली है कुछ मिनटों में ही संदेसा पहुँच जाता है,अब कौन करता है डाकिये का इंतज़ार,कौन देखता है राह कि आयेगा किसी प्रियजन का ख़त.मुझे भी लगता है कि मैं शायद फिर से कभी लोगों को याद आऊँगा ,उस पल मैं खुद को सबसे खुशनसीब पाउँगा,पर कोई मेरी सुनता ही नहीं ,मैं भी चाहता हूँ कि कोई मेरी भी सुने.

Monday, August 16, 2010

कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये!!







रोजाना जो खाना खाते हो वो पसंद नहीं आता ? उकता गये ? 


............ ... ........... .....थोड़ा पिज्जा कैसा रहेगा ? 


नहीं ??? ओके ......... पास्ता ? 

नहीं ?? .. इसके बारे में क्या सोचते हैं ?


आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या इस मेक्सिकन खाने को आजमायें ? 



दुबारा नहीं ? कोई समस्या नहीं .... हमारे पास कुछ और भी विकल्प हैं........ 
    
ह्म्म्मम्म्म्म ... चाइनीज ????? ?? 


बर्गर्सस्स्स्सस्स्स्स ? ??????? 


ओके .. हमें भारतीय खाना देखना चाहिए ....... 
  ? दक्षिण भारतीय व्यंजन ना ??? उत्तर भारतीय ? 

जंक फ़ूड का मन है ? 




हमारे  पास अनगिनत विकल्प हैं ..... .. 
  टिफिन  ? 


मांसाहार  ? 


ज्यादा मात्रा ? 


या केवल पके हुए मुर्गे के कुछ  टुकड़े ?
आप इनमें से कुछ भी ले सकते हैं ... या इन सब में से थोड़ा- थोड़ा  ले सकते हैं  ...



मगर .. इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है ...
   
इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें ..........



इनके बारे में  अगली बार तब सोचना जब आप किसी केफेटेरिया या होटल में यह कह कर खाना फैंक रहे होंगे कि यह स्वाद नहीं है !! 




इनके बारे में अगली बार सोचना जब आप यह कह रहे हों  ... यहाँ की रोटी इतनी सख्त है कि खायी ही नहीं जाती.........



कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये!! 
 

A Special Friend..................

A special Friend Is Alway's there to share thoughts and dreams a special friend is there during....
Times of pain and precious happy moments too.... A special Friend is with you when so needed Even.
Though there own Times may be Difficult A special friend is Honest with you Telling you the Truths.....
No one else will.
A Special Friend  is there Day or Night to be by your side.
And lend Comfort...
A Special Friend believes in you...And Helps You.
To believes in yourself.

Every day I wish you are here with me,I hurts couldn't be.
If I could Turn back the hands of time,You will be still be Mine........
Every day I wish I could have know you better ,so I cherish the time we had together,instead of thinking you been gone...
while I m here all Alone.........................

While I M here All Alone.........................

Whenever you are sad ,I will dry your tears,when you are scared,I will comfort your fear,when you are sick,I will be there and care,you feel my love whenever we apart knowing that nothing can change my heart,when you are worried ,I will will give u hope,When you are confused i will help you  cope.....



पत्थरों के इस शहर में आईने सा आदमी ,ढूँढने निकला है खुद को चूर चूर आदमी,
चिमनियाँ थीं ,हादसे थे,शोर था, फिर भी मगर,इस भीड़ में कोई नहीं था आदमी,
तन जलेगा मन जलेगा,घर जलेगा बाद में,रौशनी के वास्ते पहले जलेगा आदमी,
दोस्तों में ,रास्तों में,भीड़ में बाज़ार में,हर तरफ खंजर छिपे हैं क्या करेगा आदमी,
चिलचिलाती धुप में है प्यास का मारा हुआ,पाँव में छाले पड़े हैं फिर भी चलता आदमी!!!!!!!!!!!!!!

Friday, August 13, 2010

क्या हम सचमुच आज़ाद हैं............

१५ अगस्त,आते ही सारे देश में एक अजीब सी हलचल मच जाती है,हर कोई भारत वर्ष कि आज़ादी कि खुशियाँ मानाने कि तैयारी  में लगा होता है,आसमान में रंग बिरंगी पतंगे उड़ती दिखाई देती हैं तो कहीं छोटे छोटे बच्चे हाथ में तिरंगा लिए सड़कों पे दौड़ते दिखते हैं,सावन का महीना और १५ अगस्त कि धूम  के बीच में हमें यह सोचने का समय ही नहीं की हम सच मुच आज़ाद हैं,कल तक ग़ैर मुल्क के लोग हम पे हुकूमत कर रहे थे आज हम अपने ही घरों में सुरछित नहीं  हैं ,भारत की पुरानी संस्कृति है "अतिथि देवो भवः " हमने जिन्हें पनाह दी आज वही हमारे घरो में घुस कर हमारे हकों का बलात्कार किये जा रहे हैं और हम अपनी आज़ादी का जशन मानाने में लगे हैं ,सरकार जिसे हम ही चुनते हैं हमारे भविष्य के भले के लिए वही सरकार हमारे अधिकारों का शोषण कर रही हैं और हम खुश हैं यह जान कर कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं जहाँ हमें हमारे संविधान ने कुछ अधिकार दिए हैं पर क्या हम सच में उन अधिकारों का प्रयोग कर पाते हैं,असत्य के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कि आवाज़ दबा दी जाती है तो कैसा है यह भाषण का अधिकार ,सरकारी नौकरी के लिए आपकी जेब देखी जाती है तो कैसा है यह समानता का अधिकार ,१५ अगस्त के इस जशन में हम कहते हैं "दे दी हमें आजादी बिना खड्क बिना ढाल" परन्तु आज तक किसी ने यह नहीं सोचा कि अगर गाँधी नेहरु अपनी राजनीती की गन्दी चाल न चलते तो शायद हमारे देश के टुकड़े न हुए होते,न दी जाती आधी रात को भगत सिंह ,राजगुरु और,अशफाकुल्लाह को फांसी न जला दिए जाते रातों रात उनके शव उस दिन था बारिश का दिन जो अधजले शव उनके परिजनों ने थे पाए सोचो यह नेता कबसे देश को हैं छलते आये,मुझे तो समझ में नहीं आता अगर आपको आता है तो ज़रा सोच कर बताइयेगा क्या हम सचमुच आज़ाद  हैं.............

Tuesday, August 10, 2010

यह कैसी विडम्बना.......................

एक सरकारी कर्मचारी अपनी बेटी के विवाह के लिए लाखों जतन करता है ,
फिर भी इन लोभियों का पेट नहीं भरता है,रोज़ जब अखबार के पन्ने पलटती हूँ, किसी न किसी नवविवाहिता की मृत्यु की खबर देखने को मिल जाती है,इन लगों की रूह क्यूँ नहीं कांपती,किसी की औलाद की  की आँहे इनको क्यूँ नहीं भांपती,
पिता अपनी बेटी को डोली में विदा करके संतुष्ट नहीं रह पता,न जाने कब उसकी लाड़ली की कोई खबर आ जाये हर वाक्क्त उसको यही डर है सताता,किस दिन ख़तम होगा इन दहेज़ के लोभियों का अत्याचार,किस दिन न करेगा एक बाप अपनी ही बेटी का अंतिम संस्कार,क्यूँ बेटीयां  दहेज़ की बली चढ़ा दी जाती हैं,क्यूँ उसकी चीखें किसी के कानों को नहीं भेद पाती हैं,कहते हैं बेटी  लक्ष्मी है घर की,और लक्ष्मी के लिए लक्ष्मी का अपमान कैसी यह विडम्बना है जीवन की!!!!!!!!!!!!!!!!!
सुखों के बीच रहकर भी न सुखी होना आया ,यहाँ
 आदमी को आदमी होना न आया ,
वो पल बस इक पल जिंदा रहे फिर मिट गए यूँ ही,वो पल जिनको खुद सदी होना न आया ,
सितारे भी बनकर आस्मां में टिमटिमाये मगर,सितारों की चमक को चांदनी होना न आया,
हमेशा औरों की मुश्किलों पे मुस्कुराये हम,हमें गैरों की खुशियों में खुश होना न आया,
किसी की जिंदगी कैसे बनेगी  शायरी आखिर,ग़र खुद शायरी की ज़िंदगी होना न आया!!!!!!!!!

इसके एक एक शेर पे इलज़ाम है ,ये ग़ज़ल मेरी बहुत बदनाम है ,
हर तरफ मौत का पैगाम है, जिंदगी यहाँ तेरा क्या 
काम है,
तय न तक पाया ज़माना आज तक जिसे ,जिंदगी उस फलसफे का नाम है,
जिनका कल आगाज़ से कुछ रिश्ता भी न था ,उनके हाथों में आज  अंजाम है,
तोड लेना फूल को मुश्किल काम नहीं, सोचते रहिये ग़र तो मुश्किल काम है,
मौत क्या है रस्ते का इक पड़ाव जिंदगी अगले सफ़र का 
नाम है!!!!!!!!!!!! 
जब ज़िन्दगी ने साथ छोड़ा ,तब मौत का आना हुआ ,दुनिया की नज़र में ये हमारा गुज़र जाना हुआ ,
उन्हें क्या मालूम पूरे तो हम कभी आये ही न थे,जब आये ही नहीं तो कैसा यह जाना हुआ ,
दो वाक्क्त जो ठहरे क्या गुनाह किया हमने ,ये की बस एक सुबह एक शाम ही देखी हमने,
कुछ और जो ठहर जाते जहाँ से इश्क हो जाता ,इन्हीं फलसफों से कल अपना आज बेगाना हुआ,
जब तक रहीं साँसें हम मशहूर ही रहे ,ये हमपे इनयात ही कही जाएगी जो स दर्द भरी ज़िन्दगी से उसका हमें बुलना हुआ!!!!!!!


मेरी रूह को जिस्म की कैद न देना ,

बड़ी रो रो कर काटी है जिंदगी मैंने!!!!!!!!!!!!!!!

Monday, August 9, 2010

pratispardha

हम जब से इस दुनिया में  जनम लेते हैं,एक दुसरे को हराने की दौड़ में लगे रहते हैं,बिना यह यह सोचे हम किसे हराना चाहते हैं ,कोई नहीं जनता उसे क्या चाहिए अपने जीवन से ,हर इंसान कभी न ख़तम होने वाली तलाश में रहता है ,निकटतम भविष्य में जब कुछ न शेष रहेगा तब मनुष्य किस चीज़ के लिए लडेगा ,यहाँ कोई नहीं अपना जिस पे कर सको भरोसा सबका अपना स्वार्थ है जिसे सिद्ध करने के लिए सब आपस में ही  लड़ रहे हैं ,फिर चाहे  किसी का भी खून बहे अपनों का या परायों का किसी को कुछ नहीं दिखाई देता है , न जाने क्यूँ  लोग नहीं समझना चाहते जीवन एक कभी न ख़तम होने वाली प्रतिस्पर्धा है ,जिसमें वही जीत पता है जो अपनी इन्द्रियों को संतुलन में   रख सकता है..........

मेरी एक सहेली जो मुझसे बिछड़ गयी!!!!!!!!!! ... Tribute to my best friend Kalpana Bajpayee

एक सुबह जब मैं स्कूल पहुंची क्लास में छाया सन्नाटा था,सबसे पूछा हुआ क्या है कोई न मुझे कुछ बताता था !
घंटी बजी सुबह की प्रार्थना को हर कोई जाता था,मैं सोच रही थी कुछ और मन मेरा घबराता था !
आज  सुबह से देखा नहीं है उसे न उसकी कोई खबर आयी है ,पता नहीं कहा गयी वोह आज क्यूँ न स्कूल आयी वोह !
शुरू हुयी सुबह की प्रार्थना मेरी आँखे उसी को ढूंढती हैं ,कल आम का आचार लाना ऐसा कल वोह मुझसे बोली थी !
मेरी आँखें न थमती  थी जब प्राचार्य जी ने यह दुखद खबर सुनायी थी,
कल उसको किसी गाड़ी से मौत लेने आयी थी !
उस दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी के बाद हम उसके घर गए ,
उसके छोटे भाई बहन मुझसे रो कर लिपट गए!
उसके घर का मंज़र बड़ा ही मर्मई था ,उसके घर का हर व्यक्ति रोता था !
उसकी माँ को तो होश ही न था उनकी लाड़ली नहीं रही,उसके पापा को भी इस बात पे यकीं होता न था !
घर का हर कोना चीख पुकार रहा था, घर में दो-दो मौतों का मातम अपनी काली छाया पसार रहा था !
उसका डेढ़ साल का छोटा भाई जिसने दुनिया देखी भी न थी ,यह दर्दनाक मौत उसको भी निगल गयी!
कहते हैं मेरी सहेली का शरीर छलनी हो गया था,जब एक बेलगाम ट्रक उसी रौंध कर गया था!
वोह मेरी सबसे प्यारी सहेली जो आज मुझसे बिछड़ गयी,
मेरी आँखे  आज भी नहीं भूली है उसकी वोह प्यारी बातें और उसकी आँखों में बड़े बड़े सपने !
पापा से कहती थी वोह मैं बहुत नाम कमाऊंगी, मुझे खेल लेने दो कल मैं कुछ बन कर दिखाऊंगी!
आज भी उसकी छोटी बहिन जब कहीं मिल जाती है,दीदी दीदी कह कर सीने से लग जाती है, याद है मुझे आज भी मुझे उसका वोह पेंसिल की नोक  का खाना ,और मुझसे झूठ बुलवाना अपने पापा से की काला चूरन खाया है, 
उसकी वोह मुस्कराहट आज भी याद आती है,उसकी आँखों की चमक आज भी कुछ कह जाती है,
क्यूँ  ऊपर वाले को हर अच्छे इंसान को अपने पास बुलाना होता है ,बस उसकी याद में हमें रुलाना होता है,
याद बहुत आती हैं मुझको अकेला छोड़ के किधर गयी मेरी एक सहेली जो मुझसे बिछड़ गयी!!!!!!!!!!

Mere Bharat Ko kuch na kehna

Mere Bharat Ko kuch na kehna iske har zarre se mera shesh bana hai
Iski maati ki khushbu hai mere paseene mein iski  hawaon mein avsesh mera hai .
Iske parvato se behte jharne jeena sikhate hain mujhe ,mere hone ka ahsas karate hain mujhe.
Mera to kahin namonishan bhi na tha ,jaane kaise mujhe mera naam mila hai.
Main khule gagan mein pankh failaye udne ki tamnna liye aayee thi is anjaan shehar mein ,
Lekin aaj yeh lagta hain ki har ek mera hai.
Har pal har jagah hai mara mari naukri ki kahin bhookh aur lachari ,
Koi dukhi hai ki uska hath hai khali ,kisi ko dukh hai ki aaj mera na pet bhara hai.
Kabhi sochti hoon ki kisi se poochoun yeh kyun hai aisa,lekin mann kehta hai na pooch is dukh se hare k mara hai!!!!