१५ अगस्त,आते ही सारे देश में एक अजीब सी हलचल मच जाती है,हर कोई भारत वर्ष कि आज़ादी कि खुशियाँ मानाने कि तैयारी में लगा होता है,आसमान में रंग बिरंगी पतंगे उड़ती दिखाई देती हैं तो कहीं छोटे छोटे बच्चे हाथ में तिरंगा लिए सड़कों पे दौड़ते दिखते हैं,सावन का महीना और १५ अगस्त कि धूम के बीच में हमें यह सोचने का समय ही नहीं की हम सच मुच आज़ाद हैं,कल तक ग़ैर मुल्क के लोग हम पे हुकूमत कर रहे थे आज हम अपने ही घरों में सुरछित नहीं हैं ,भारत की पुरानी संस्कृति है "अतिथि देवो भवः " हमने जिन्हें पनाह दी आज वही हमारे घरो में घुस कर हमारे हकों का बलात्कार किये जा रहे हैं और हम अपनी आज़ादी का जशन मानाने में लगे हैं ,सरकार जिसे हम ही चुनते हैं हमारे भविष्य के भले के लिए वही सरकार हमारे अधिकारों का शोषण कर रही हैं और हम खुश हैं यह जान कर कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं जहाँ हमें हमारे संविधान ने कुछ अधिकार दिए हैं पर क्या हम सच में उन अधिकारों का प्रयोग कर पाते हैं,असत्य के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कि आवाज़ दबा दी जाती है तो कैसा है यह भाषण का अधिकार ,सरकारी नौकरी के लिए आपकी जेब देखी जाती है तो कैसा है यह समानता का अधिकार ,१५ अगस्त के इस जशन में हम कहते हैं "दे दी हमें आजादी बिना खड्क बिना ढाल" परन्तु आज तक किसी ने यह नहीं सोचा कि अगर गाँधी नेहरु अपनी राजनीती की गन्दी चाल न चलते तो शायद हमारे देश के टुकड़े न हुए होते,न दी जाती आधी रात को भगत सिंह ,राजगुरु और,अशफाकुल्लाह को फांसी न जला दिए जाते रातों रात उनके शव उस दिन था बारिश का दिन जो अधजले शव उनके परिजनों ने थे पाए सोचो यह नेता कबसे देश को हैं छलते आये,मुझे तो समझ में नहीं आता अगर आपको आता है तो ज़रा सोच कर बताइयेगा क्या हम सचमुच आज़ाद हैं.............
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