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Tuesday, August 10, 2010

सुखों के बीच रहकर भी न सुखी होना आया ,यहाँ
 आदमी को आदमी होना न आया ,
वो पल बस इक पल जिंदा रहे फिर मिट गए यूँ ही,वो पल जिनको खुद सदी होना न आया ,
सितारे भी बनकर आस्मां में टिमटिमाये मगर,सितारों की चमक को चांदनी होना न आया,
हमेशा औरों की मुश्किलों पे मुस्कुराये हम,हमें गैरों की खुशियों में खुश होना न आया,
किसी की जिंदगी कैसे बनेगी  शायरी आखिर,ग़र खुद शायरी की ज़िंदगी होना न आया!!!!!!!!!

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