फिर भी इन लोभियों का पेट नहीं भरता है,रोज़ जब अखबार के पन्ने पलटती हूँ, किसी न किसी नवविवाहिता की मृत्यु की खबर देखने को मिल जाती है,इन लगों की रूह क्यूँ नहीं कांपती,किसी की औलाद की की आँहे इनको क्यूँ नहीं भांपती,
पिता अपनी बेटी को डोली में विदा करके संतुष्ट नहीं रह पता,न जाने कब उसकी लाड़ली की कोई खबर आ जाये हर वाक्क्त उसको यही डर है सताता,किस दिन ख़तम होगा इन दहेज़ के लोभियों का अत्याचार,किस दिन न करेगा एक बाप अपनी ही बेटी का अंतिम संस्कार,क्यूँ बेटीयां दहेज़ की बली चढ़ा दी जाती हैं,क्यूँ उसकी चीखें किसी के कानों को नहीं भेद पाती हैं,कहते हैं बेटी लक्ष्मी है घर की,और लक्ष्मी के लिए लक्ष्मी का अपमान कैसी यह विडम्बना है जीवन की!!!!!!!!!!!!!!!!!
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