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Monday, August 16, 2010

पत्थरों के इस शहर में आईने सा आदमी ,ढूँढने निकला है खुद को चूर चूर आदमी,
चिमनियाँ थीं ,हादसे थे,शोर था, फिर भी मगर,इस भीड़ में कोई नहीं था आदमी,
तन जलेगा मन जलेगा,घर जलेगा बाद में,रौशनी के वास्ते पहले जलेगा आदमी,
दोस्तों में ,रास्तों में,भीड़ में बाज़ार में,हर तरफ खंजर छिपे हैं क्या करेगा आदमी,
चिलचिलाती धुप में है प्यास का मारा हुआ,पाँव में छाले पड़े हैं फिर भी चलता आदमी!!!!!!!!!!!!!!

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