हम जब से इस दुनिया में जनम लेते हैं,एक दुसरे को हराने की दौड़ में लगे रहते हैं,बिना यह यह सोचे हम किसे हराना चाहते हैं ,कोई नहीं जनता उसे क्या चाहिए अपने जीवन से ,हर इंसान कभी न ख़तम होने वाली तलाश में रहता है ,निकटतम भविष्य में जब कुछ न शेष रहेगा तब मनुष्य किस चीज़ के लिए लडेगा ,यहाँ कोई नहीं अपना जिस पे कर सको भरोसा सबका अपना स्वार्थ है जिसे सिद्ध करने के लिए सब आपस में ही लड़ रहे हैं ,फिर चाहे किसी का भी खून बहे अपनों का या परायों का किसी को कुछ नहीं दिखाई देता है , न जाने क्यूँ लोग नहीं समझना चाहते जीवन एक कभी न ख़तम होने वाली प्रतिस्पर्धा है ,जिसमें वही जीत पता है जो अपनी इन्द्रियों को संतुलन में रख सकता है..........
Rakha kaise jaye? :-/ santulan mushkil nahi hai? bade bade rishi-muni nahi rakh sake...
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